Monday, September 3, 2012

Back to "बचपन"

मुज़मे और तुज मे भी कही छुपा होता हे..
आओ ढूँढे उसे..
एक बच्चा हर किसी मे होता हे...

वो बारिश का इंतजार..
फिर उसमे भीगना बेशुमार..
कागज की कश्ती को बहेते  हुए
यूँ देखते रहना..
पैरो से पानी मे छींटे उड़ाना..

चलो चले फिर उस राह पे..
जहाँ ना मंज़िल की फ़िक्र..
ना अंजान रस्तो का डर होता हे..

पेड़ो की शाखो पर ज़ुले बनाना,
खेत, नाले ओर नदिओ को टटोलना,
रेत, मिट्टी ओर पथरो से उलजना,
क्या खूब आता था तब जिंदगी जीना,

चलो चले फिर उन कहानियो मे,
जहा सहेजादो का डेरा ओर,
परिओ का बसेरा होता हे..

ना जाने कब बचपन पीछे छूटा..
मासूमियत से फिर नाता टूटा..
बड़े होने से क्यूँ इंसान बदलता हे..

चलो ढूँढे उसे..
एक बच्चा हर किसी मे छुपा होता हे..

'विरल'

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